राष्ट्रपति चुनाव पर हथियार डालने के मूड में नहीं विपक्ष
ज्यादातर राज्यों में भाजपा की सरकारें होने से राष्ट्रपति चुनाव में राजग मजबूत स्थिति में है। ऐसे में कांग्रेस गैर राजग दलों के बीच व्यापक एकता कायम करना चाहती है।
कृष्ण प्रताप सिंह
देश के अगले राष्ट्रपति का चुनाव दिलचस्प होने की उम्मीदें अब और बढ़ गई हैं क्योंकि सत्तारूढ़ भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) द्वारा अपने उम्मीदवार की जीत के लिए जरूरी आंकड़े जुटा लेने के बावजूद विपक्ष उसके समक्ष आत्मसमर्पण करने अथवा हथियार डालने के मूड में नहीं है। गत दिनों कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा संसद भवन परिसर में दिए गए दोपहर के भोज में 17 गैर राजग राजनीतिक दलों ने जिस तरह अपनी कमजोरी को ढांपते हुए चतुराई पूर्वक गेंद राजग के, और साफ कहें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के, पाले में लुढ़का दी है, उससे भी साफ हो गया है कि देश के सर्वोच्च पद के लिए उम्मीदवारियां तय होने तक दोनों पक्षों में ‘तू डाल-डाल तो मैं पात-पात’ का खेल चलता रहेगा।
अब जब विपक्ष ने कह दिया है कि सत्तापक्ष इस सर्वोच्च पद के लिए सर्वसम्मति बनाने का अपना पारंपरिक दायित्व नहीं निभाता तो वह उसके उम्मीदवार के खिलाफ अपना साझा उम्मीदवार उतारेगा, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी, जैसी कि उनकी आदत है, उसे हैरान, परेशान या कम से कम चकित करने से कम पर रुकने वाले नहीं। अपनी पार्टी के मुख्यमंत्रियों तक के चयन में उन्हें अप्रत्याशित से कुछ कम पर संतोष नहीं होता तो राष्ट्रपति जैसे शक्तिशाली पद के लिए उम्मीदवार चुनते हुए वह कोई पहलू अविचारित छोड़ देंगे, ऐसा उनके समर्थक तो क्या विरोधी या उनसे असहमत लोग भी नहीं सोचते। बहरहाल, इस सिलसिले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मुखिया मोहन भागवत और भाजपा मार्गदर्शक मंडल के सदस्यों लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के नामों पर चर्चा शुरू होकर बंद भी हो चुकी है।
कहते हैं कि मोहन भागवत उसी सिद्धांत के कारण यह चुनाव नहीं लड़ना चाहते, अटल के राज में जिसके कारण नाना जी देशमुख ने ‘राष्ट्रपति भवन का कैदी’ बनने से इनकार कर दिया था। वर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बारे में संभावना है कि उनके नाम पर आम सहमति की स्थिति में वह फिर से उम्मीदवारी के लिए तैयार हो सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी उनसे कोई बड़ी शिकायत नहीं है, लेकिन जो एक बड़ा कारक उनकी संभावनाओं के आड़े आने वाला है, वह यह कि भाजपा पहली बार ‘अपना’ राष्ट्रपति चुनवाने की स्थिति में आई है तो इस अवसर को कांग्रेसी पृष्ठभूमि वाले प्रणब के लिए शायद ही जाया करना चाहे। और भाजपा अभी वैसा करने नहीं जा रही है। वह ऐसा चाहती तो उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ही क्या बुरे हैं और वे ‘नरेंद्र मोदी के कलाम’ क्यों नहीं हो सकते?
पिछले दिनों उनकी बेगम तीन तलाक को लेकर भाजपा के अभियान और मोदी सरकार के नजरिये की मुक्त कंठ से प्रशंसा भी कर चुकी हैं। जो भी हो, राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी को लेकर राजनीति इस कारण भी कुछ ज्यादा सरगर्म रहने की उम्मीद है कि 2019 के लोकसभा चुनाव और गुजरात, हिमाचल प्रदेश व कर्नाटक जैसे राज्यों के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस गैर राजग विपक्षी पार्टियों के बीच व्यापक एकता कायम करने के फेर में है और राष्ट्रपति चुनाव उसे इसके लिए सबसे उपयुक्त अवसर लग रहा है। राजग की स्पष्ट बढ़त के बावजूद कांग्रेस को लगता है कि विपक्ष उसे आम सहमति के लिए मजबूर कर सके या व्यापक गठबंधन करके साझा प्रत्याशी उतारे और उसके प्रत्याशी को कड़ी चुनौती पेश करे तो उसका संदेश दूर-दूर तक सुना जाएगा।कांग्रेस के एकता प्रयासों के रास्ते की सबसे बड़ी सुविधा जहां यह है कि नरेंद्र मोदी के बढ़ते हुए डर ने ज्यादातर गैर भाजपा, गैर राजग पार्टियों को इंदिरा गांधी के दौर में पहुंचा दिया है, जब उनके ट्रैप में फंसे समूचे विपक्ष को उनसे पार पाने के लिए एक होने के सिवाय कोई और रास्ता नहीं सूझा था। जानकारों की मानें तो जब भी बाढ़ आती है, परस्पर विरोधी स्वभावों व स्वार्थो वाले जीव-जंतु भी एक जगह शरण लेने से नहीं चूकते। ऐसे में ‘मोदी की बाढ़’ को लेकर किए जा रहे आकलनों के समान हो जाने पर बहुत संभव है कि अस्तित्व बचाने के लिए यह सबकी सब कांग्रेस को गैर भाजपावाद का नया इतिहास रचने का मौका दे दें। मगर असुविधाओं पर जाएं तो अभी तो वे इस सुविधा से बड़ी ही दिख रही हैं।
क्षेत्रीय राजनीति में यह इन पार्टियों में कई अपने-अपने राज्यों में एक दूजे के आमने-सामने रहती हैं और मोदी का डर उनसे कहवा कुछ भी ले, वहां उनके लिए अपने ही स्वार्थ सबसे ऊपर रहेंगे। ऐसे में यह सवाल अपनी जगह बना ही रहने वाला है कि राज्यों में एक दूजे को फूटी आंखों न देख पाने वाली इन पार्टियों की ‘राष्ट्रीय’ एकता क्या ‘ऊपर से तो दिल मिला, भीतर फांकें तीन’ जैसी ही नहीं होगी? कई लोग तो कहते हैं कि इसी कारण सोनिया की भोज राजनीति की शुरुआत भी प्रथमग्रासे मक्षिकापात: जैसी ही हुई। उसमें आम आदमी पार्टी को बुलाया नहीं गया तो बिहार के मुख्यमंत्री व जदयू के अध्यक्ष नीतीश कुमार ने आने से मना कर दिया। अपने प्रतिनिधि के तौर पर शरद यादव को भेजकर भी वह इन चर्चाओं को विराम नहीं लगा पाए कि भोज में लालू की उपस्थिति के कारण उन्होंने उससे अनुपस्थित रहने का रास्ता चुना।
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वैसे भी वह बिहार में राष्ट्रीय जनता दल से अपने खराब रिश्तों के चलते बार-बार महागठबंधन से अलग लाइन लेते और जताते रहते हैं कि अपनी सरकार बचाने के लिए जरूरत हुई तो ‘धर्मनिरपेक्ष’ बने रहने का ज्यादा मोह नहीं करने वाले और राजग में पुनर्प्रवेश का दांव भी आजमा सकते हैं। कभी मोदी के साथ नजर आने से परहेज करने वाले नीतीश अगर नोटबंदी व शराबबंदी को लेकर उनके साथ जुगलबंदी के बाद मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविन्द जगन्नाथ के सम्मान में दिए लंच का उनका न्यौता इस आधार पर कुबूल कर लेते हैं कि अतिथि प्रधानमंत्री बिहारी मूल के हैं, तो इसका एक अर्थ यह भी है कि किसी ऐसे ही तर्क पर वह किसी दिन सोनिया की विपक्षी एकता की कवायदों को पलीता भी लगा सकते हैं।
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पिछले दिनों बिना किसी विचार-विमर्श के अपनी ओर से प्रणब का नाम उछाल कर वह इसकी एक कोशिश कर भी चुके हैं। ऐसे में सवाल अपनी जगह है कि उत्तर प्रदेश में सपा व बसपा और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस व वामदलों की दुश्मनी और बिहार में राजद व जदयू के रिश्तों की असहजता खत्म हुए बिना किसी सार्थक या लंबी उम्र वाली विपक्षी एकता का सपना भी कैसे देखा जा सकता है? अगर अपने-अपने राज्यों में इनमें ‘हम भी डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे’ का माहौल ही बना रहता है, तो इस बात को लेकर भी संशय बरकरार ही रहना है कि यह सब मिलकर राष्ट्रपति चुनाव में एकजुटता का प्रदर्शन कर भी पाएंगे या नहीं। बाकी बातें तो अभी बातें हैं और बातों का क्या?
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)