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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 09, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

नीतीश कुमार के एनडीए छोड़ने का असली मकसद कुछ और, उपेंद्र कुशवाहा के बयान का मतलब समझ‍िए

By Shubh Narayan PathakEdited By:
Published: Tue, 09 Aug 2022 05:29 PM (IST)Updated: Tue, 09 Aug 2022 05:58 PM (IST)

Bihar Politics बड़े लक्ष्य को साधने के लिए राजग से अलग हुए नीतीश कुमार। सीएम की कुर्सी नहीं इस बार ...और पढ़ें

Bihar Political Crisis: तेज प्रताप यादव, नीतीश कुमार और तेजस्‍वी यादव। जागरण
Bihar Political Crisis: तेज प्रताप यादव, नीतीश कुमार और तेजस्‍वी यादव। जागरण

अरुण अशेष, पटना। बात इतनी भर नहीं है कि असहज हो रहे रिश्ते के कारण मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भाजपानीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) से नाता तोड़ लिया है। 2013 में इसी तरह के अलगाव को याद करें तो पता चलेगा कि नीतीश ने यह फैसला किसी बड़े लक्ष्य को ध्यान में रख कर किया है। वह लक्ष्य 2024 के चुनाव में विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद का साझा उम्मीदवार बनना हो सकता है। 2014 से तुलना करें तो अभी नीतीश के लिए स्थितियां अधिक अनुकूल हैं। उस समय संप्रग (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) की सरकार थी। प्रधानमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार संप्रग के हो सकते थे। आज विपक्ष के पास कोई सर्वमान्य चेहरा नहीं है। जदयू की सोच है कि नीतीश इस रिक्ति को भर सकते हैं।

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वर्ष 2013 में भाजपा से अलग होने के समय भी कुछ ऐसा ही भाव था। 2010 के विधानसभा चुनाव की शानदार कामयाबी से उत्साहित नीतीश कुमार को लग रहा था कि 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को उतनी सीटें मिल जाएंगी, जिससे किसी दल को बहुमत न मिलने की हालत में उनके नाम पर सहमति बन सके। उस दौर में भाजपा के पीएम उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी से नीतीश का विरोध खुल कर सामने आ गया था। हालांकि, चुनाव का परिणाम भाजपा के पक्ष में गया। इधर नीतीश की पार्टी (जदयू) को लोकसभा की केवल दो सीटें मिलीं। यह परिणाम हतोत्साहित करने वाला था। नीतीश ने नैतिक जिम्‍मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री का पद छोड़ दिया। लेकिन, हालात ऐसे बदले कि कुछ महीने बाद 2015 में फिर मुख्यमंत्री बने।

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2019 में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला। जदयू के लोकसभा सदस्यों की संख्या दो से 16 पर पहुंच गई, लेकिन प्रधानमंत्री पद की वैकेंसी नहीं थी। फिर भी नीतीश राजग में बने रहे। 2020 के विधानसभा चुनाव की खराब उपलब्धि ने उन्हें झकझोर कर रख दिया। इधर, धीरे-धीरे नीतीश को यह यकीन हो गया कि भाजपा साथ रह कर उनकी जड़ काट रही है। उधर, राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री पद के लिए किसी सर्वमान्य चेहरे की अनुपस्थिति ने भी नीतीश के समर्थकों को बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रेरित किया। यह अकारण नहीं है कि भाजपा से अलग होने की आधिकारिक खबर से पहले जदयू संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने ट्वीट कर दिया था-नीतीश में प्रधानमंत्री बनने की सभी योग्यता है। नीतीश जी आप आगे बढि़ए। देश आपका इंतजार कर रहा है। 

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भाजपा के सभी विरोधी दलों का मिला साथ

नीतीश कुमार अब जिस सरकार की अगुआई करने जा रहे हैं, उसमें कांग्रेस, राजद और वाम दल भी शाम‍िल हो सकते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस और वाम दल की बड़ी भूमिका हो सकती है। क्षेत्रीय दल के रूप में राजद की पहचान है। उसका समाजवादी पार्टी से अच्छा संबंध है। तृणमूल की सर्वेसर्वा ममता बनर्जी के साथ भी नीतीश के रिश्ते अच्छे रहे हैं। राकांपा के शरद पवार, बीजद के नवीन पटनायक और झारखंड के हेमंत सोरेन से भी उनका रिश्ता हमेशा अच्छा रहा है। हालांकि, नीतीश कुमार प्रत्यक्ष रूप से किसी पद की आकांक्षा से इन्कार करते रहे हैं, लेकिन यह भी सच है कि देश में भाजपा के खिलाफ खड़ी किसी अन्य क्षेत्रीय नेता की तुलना में नीतीश की स्वीकार्यता अधिक है। राजग की सरकार में वर्षों तक केंद्र में मंत्री रहने के समय भी नीतीश ने सभी क्षेत्रीय दलों से अच्छा संबंध बना कर रखा। 

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