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Mahakaleshwar Temple: इस वजह से उज्जैन में महाकाल कहलाए भोलेनाथ, जानें इस नगरी से जुड़ी कई दिलचस्प बातें

Mahakaleshwar Temple धार्मिक नगरी उज्जैन पूरी दुनिया में काफी मशहूर है। यहां 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक महाकाल मंदिर स्थित है। इसके अलावा हर 12 साल में कुंभ मेले का भी आयोजन किया जाता है जो सिंहस्थ के नाम से जाना जाता है। इस शहर की और भी कई ऐसी बातें जिससे आप शायद आज तक अनजान हैं तो चलिए जानते हैं इस शहर से जुड़ी दिलचस्प बातें-

By Harshita SaxenaEdited By: Harshita SaxenaUpdated: Thu, 17 Aug 2023 07:15 AM (IST)
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जानें क्यों महाकाल कहलाए उज्जैन के स्थित महादेव
नई दिल्ली, लाइफस्टाइल डेस्क। Mahakaleshwar Temple: मध्य प्रदेश के शहर उज्जैन का नाम तो हर किसी ने सुना होगा। अपनी धार्मिक मान्यताओं के लिए मशहूर यह शहर पूरी दुनिया में दो चीजों के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता है। पहला यहां स्थित बाबा महाकाल का मंदिर और दूसरा यहां होने वाला कुंभ। प्राचीन नगरी उज्जैन में मौजूद महाकाल मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योर्तिलिंगों में से है। कालों के काल बाबा महाकाल के इस मंदिर के दर्शन करने दूर-दूर से हर साल लाखों की संख्या में भक्त यहां पहुंचते हैं। भगवान शिव के इस स्वरूप का वर्णन शिव पुराण में भी विस्तार से मिलता है।

हम सभी ने भगवान शिव के इस मंदिर की पौराणिक कथा तो कई बार सुनी होगी, लेकिन वैज्ञानिक महत्व शायद ही आप जानते होंगे। अगर आप आने वाले दिनों में बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन जाने का मन बना रहे हैं, तो आज हम आपको इस मंदिर और इसके नाम से जुड़ा दिलचस्प इतिहास बताने जा रहे हैं।

पृथ्वी का केंद्र है उज्जैन

हम सभी ने बचपन से पढ़ा है कि हमारी पृथ्वी गोलाकार है, लेकिन जब भी बात इसके केंद्र बिंदु की आती है, तो लोग अक्सर सोच में पड़ जाते हैं। ऐसे में अगर हम आपसे यह कहे कि मध्य प्रदेश का शहर उज्जैन ही पृथ्वी का केंद्र बिंदु है, तो क्या आप इस पर यकीन करेंगे। दरअसल, ऐसा हम नहीं बल्कि खुद खगोल शास्त्री मानते हैं। खगोल शास्त्रियों के मुताबिक मध्य प्रदेश का यह प्राचीन शहर धरती और आकाश के बीच में स्थित है। यहां तक कि शास्त्रों में भी उज्जैन को देश का नाभि स्थल बताया गया है। वराह पुराण में भी उज्जैन नगरी को शरीर का नाभि स्थल और बाबा महाकालेश्वर को इसका देवता कहा बताया गया है।

इसलिए महादेव कहलाए महाकाल

भोलेनाथ की नगरी उज्जैन हमेशा से ही काल-गणना के लिए बेहद उपयोगी एवं महत्वपूर्ण मानी जाती रही है। देश के नक्शे में यह शहर 23.9 डिग्री उत्तर अक्षांश एवं 74.75 अंश पूर्व रेखांश पर स्थित है। इतना ही नहीं खुद ऋषि-मुनि भी यह मानते आए हैं कि उज्जैन शून्य रेखांश पर स्थित है। कर्क रेखा भी इस शहर के ऊपर से गुजरती है। इसके अलावा उज्जैन ही वह शहर है, जहां कर्क रेखा और भूमध्य रेखा एक-दूसरे को काटती है। इस प्राचीन नगरी की इन्हीं विशेषताओं को ध्यान में रख काल-गणना, पंचांग निर्माण और साधना के लिए उज्जैन को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यही वजह है कि प्राचीन समय से ज्योतिषाचार्य यहीं से भारत की काल गणना करते आए हैं। काल की गणना की वजह से ही यहां के आराध्य भगवान शिव को महाकाल के नाम से जाना जाता है।

दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है महाकाल

उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर का पौराणिक महत्व भी है। इस मंदिर को लेकर ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव ने यहां दूषण नामक राक्षस का वध कर अपने भक्तों की रक्षा की थी, जिसके बाद भक्तों के निवेदन के बाद भोलेबाबा यहां विराजमान हुए थे। यह मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से तीसरा ज्योतिर्लिंग है। इसकी खास बात यह है कि यह एक मात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है, जो दक्षिणमुखी है।

यही वजह है कि तंत्र साधना के लिहाज से इसे काफी अहम माना जाता है, क्योंकि तंत्र साधना के लिए दक्षिणमुखी होना जरूरी है। इस मंदिर को लेकर एक मान्यता यह भी है कि यहां भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए थे। साथ ही पुराणों में भी ऐसा कहा गया है कि उज्जैन की स्थापना खुद ब्रह्माजी ने की थी। यह भी मान्यता है कि महाकाल के दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

उज्जैन से मिला विक्रम संवत कैलेंडर

काल गणना के अलावा उज्जैन शहर अपने राजा विक्रमादित्य की वजह से भी काफी जाना जाता है। दरअसल, प्राचीनकाल में इस नगरी में राज करने वाले राजा विक्रमादित्य ने हिंदुओं के लिए एक ऐतिहासिक कैलेंडर विक्रम संवत निर्माण कराया था, जो वर्तमान में एक प्रचलित हिन्दू पंचांग है। इसी पंचांग के आधार पर भारत के उत्तरी, पश्चिमी और मध्य भाग में व्रत-त्योहार मनाए जाते हैं। इतना ही नहीं इस संवत को नेपाल में भी मान्यता मिली हुई है। विक्रम संवत से पहले देश में युधिष्ठिर संवत, कलियुग संवत और सप्तर्षि संवत भी प्रचलित रह चुके हैं।

उज्जैन के कुंभ को क्यों कहते हैं सिंहस्थ

हिंदू धर्म में उज्जैन शहर का अपना अलग महत्व है। यह प्राचीन धार्मिक नगरी देश के 51 शक्तिपीठों और चार कुंभ स्थलों में से एक है। यहां हर 12 साल में पूर्ण कुंभ तथा हर 6 साल में अर्द्धकुंभ मेला लगता है। हालांकि, उज्जैन में होने वाले कुंभ मेले को सिंहस्थ कहा जाता है। दरअसल, सिंहस्थ का संबंध सिंह राशि से है। जब सिंह राशि में बृहस्पति और मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होता है, तो उज्जैन में कुंभ का आयोजन होता है, जिसे सिंहस्थ के नाम से जाना जाता है।

इन नामों से भी जाना जाता है उज्जैन

क्षिप्रा नदी के तट पर बसे होने की वजह से इस शहर को शिप्रा के नाम से भी जाना जाता है। इसके अलावा यह प्राचीन नगरी संस्कृत के महान कवि कालिदास की नगरी के नाम से भी काफी प्रचलित है। वहीं, बात करें इसके प्राचीन नामों की, तो उज्जैन को पहले अवन्तिका, उज्जयनी, कनकश्रन्गा के नाम से भी जाना जाता था। यह मध्य प्रदेश के पांचवें सबसे बड़े शहरों में से है, जो अपनी धार्मिक मान्यातों के चलते दुनियाभर में पर्यटन का प्रमुख स्थल है। महाकालेश्वर मंदिर के अलावा यहां गणेश मंदिर, हरसिद्धि मंदिर, गोपाल मंदिर, मंगलनाथ मंदिर,काल भैरव मंदिर भी काफी प्रसिद्ध है।

Picture Credit- Instagram