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टीबी के खिलाफ नई उम्मीद! दिल्ली के मिरांडा हाउस की लैब में विकसित हो रही नई पीढ़ी की वैक्सीन

Published: Thu, 02 Apr 2026 12:58 AM (IST)

मिरांडा हाउस की लैब में वैज्ञानिकों ने टीबी के खिलाफ नई उम्मीद जगाई है। वे एक नई पीढ़ी की सबयूनिट ...और पढ़ें

मिरांडा हाउस की लैब में वैज्ञानिकों ने टीबी के खिलाफ नई उम्मीद जगाई है। फाइल फोटो

मिरांडा हाउस की लैब में वैज्ञानिकों ने टीबी के खिलाफ नई उम्मीद जगाई है। फाइल फोटो

लोकेश शर्मा, नई दिल्ली। देश में ट्यूबरक्लोसिस (टीबी) के खिलाफ जंग को मजबूत करने की दिशा में मिरांडा हाउस की एक लैब से उम्मीद की नई किरण सामने आई है। यहां वैज्ञानिकों की टीम न सिर्फ टीबी की नई पीढ़ी की वैक्सीन विकसित कर रही है, बल्कि ऐसी सरल जांच तकनीक पर भी काम कर रही है जिससे बीमारी का शुरुआती चरण में ही सटीक पता लगाया जा सके।

दिल्ली विश्वविद्यालय के इस प्रतिष्ठित संस्थान के जूलॉजी विभाग स्थित डीएस कोठारी सेंटर बायोडिस्कवरी लैबोरेटरी में प्रोफेसर साधना शर्मा और प्रोफेसर मोनिका शर्मा के नेतृत्व में शोधकर्ता लंबे समय से इस दिशा में काम कर रहे हैं। उनका उद्देश्य टीबी जैसी गंभीर और संक्रामक बीमारी को नियंत्रित करने के लिए अधिक प्रभावी और व्यावहारिक समाधान विकसित करना है। दोनों प्रोफेसर पिछले 20 वर्षों से इस विषय पर शोध कर रही है।

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टीबी माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस बैक्टीरिया के कारण होती है, मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करती है लेकिन शरीर के अन्य हिस्सों में भी फैल सकती है। वैश्विक स्तर पर यह बीमारी आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। दवाओं के प्रति बढ़ता प्रतिरोध (ड्रग रेसिस्टेंस) स्थिति को और गंभीर बना रहा है।

वर्तमान में उपलब्ध बीसीजी वैक्सीन बच्चों में कुछ हद तक सुरक्षा प्रदान करती है, लेकिन वयस्कों में इसकी प्रभावशीलता सीमित है। इसी कमी को दूर करने के लिए वैज्ञानिक “सबयूनिट वैक्सीन” विकसित कर रहे हैं। यह वैक्सीन टीबी बैक्टीरिया के डार्मेंसी प्रोटीन (डीओएसआर वीसी1 और डीओएसआर वीसी2) पर आधारित है, जो बैक्टीरिया की निष्क्रिय अवस्था में सक्रिय रहते हैं।

शुरुआती परीक्षणों में यह वैक्सीन चूहों पर प्रभावी साबित हुई है। जिन चूहों को यह वैक्सीन दी गई, उनके फेफड़ों में बैक्टीरिया की संख्या कम पाई गई और उनकी स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही। यह परिणाम आगे के परीक्षणों के लिए उत्साहजनक माने जा रहे हैं।

इस वैक्सीन को “प्राइम-बूस्ट” रणनीति के तहत विकसित किया जा रहा है, जिसमें पहले एक प्रारंभिक डोज और फिर एक बूस्टर डोज दी जाती है। इसके बाद बैक्टीरिया के संपर्क में लाकर वैक्सीन की क्षमता का परीक्षण किया जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार शुरुआती नतीजे सकारात्मक हैं और अब इसे क्लिनिकल ट्रायल की दिशा में आगे बढ़ाने की तैयारी की जा रही है।

शोधकर्ताओं ने इस तकनीक के लिए पेटेंट आवेदन भी कर दिया है और अब इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) और उद्योग जगत के सहयोग से क्लिनिकल ट्रायल शुरू करने की योजना बनाई जा रही है। ट्रायल के तीन चरणों में इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता का विस्तृत परीक्षण होगा।

इसके साथ ही, टीम टीबी की पहचान को आसान बनाने पर भी काम कर रही है। पारंपरिक जांच प्रक्रियाएं समय लेने वाली और कई बार कम सटीक होती हैं। इसे देखते हुए वैज्ञानिक यूरिन आधारित जांच तकनीक विकसित कर रहे हैं। साथ ही ब्लड सीरम में एंटीजन की पहचान के जरिए छिपी हुई (लेटेंट) टीबी का पता लगाने की दिशा में भी शोध जारी है।

प्रोफेसर मोनिका शर्मा की टीम बायोइन्फॉर्मेटिक्स टूल्स की मदद से पीपीई वीसी1 और पीपीई वीसी2 जैसे विशेष प्रोटीन की पहचान कर रही है। इन प्रोटीन के एपिटोप्स के आधार पर मल्टी-एपिटोप वैक्सीन डिजाइन की गई है, जो शरीर में मजबूत इम्यून प्रतिक्रिया उत्पन्न करने की क्षमता रखती है।

शोध में यह भी सामने आया है कि डायबिटीज से पीड़ित लोगों में टीबी का खतरा अधिक होता है, क्योंकि उनका इम्यून सिस्टम कमजोर होता है। वहीं, टीबी के मरीजों में भी डायबिटीज विकसित होने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे दोनों बीमारियों के बीच संबंध और स्पष्ट होता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, टीबी हवा के माध्यम से फैलती है, इसलिए खांसते या छींकते समय मुंह ढकना, भीड़भाड़ से बचना और संतुलित आहार लेना बेहद जरूरी है। समय पर जांच और पूरा इलाज भी इस बीमारी को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दुनिया की लगभग 25 प्रतिशत आबादी में टीबी बैक्टीरिया निष्क्रिय अवस्था में मौजूद है, जो इम्यून सिस्टम कमजोर होने पर सक्रिय हो सकता है।

ऐसे में नई वैक्सीन और आधुनिक जांच तकनीकों का विकास टीबी उन्मूलन की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है। मिरांडा हाउस की यह पहल भविष्य में “टीबी मुक्त दुनिया” के लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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