यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 28, 2015 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
अंताक्षरी के शौक ने बना दिया कवि
लोकेश चौहान, नोएडा : ''राह जो मैने पकड़ ली, जिंदगी में बढ़ रहा हूं उसी पर नींव जो रख दी इमारत ब

लोकेश चौहान, नोएडा :
''राह जो मैने पकड़ ली, जिंदगी में बढ़ रहा हूं उसी पर
नींव जो रख दी इमारत बंदगी की, गढ़ रहा हूं मैं उसी पर
शोध कितने ही किए हैं, छंद, भाषा, गीत और निबंध पर भी
हास्य का उन्नत शिखर है लक्ष्य अपना, चढ़ रहा हूं मैं उसी पर''
बचपन में शौक था अंताक्षरी का, उस समय इतना पता नहीं था कि भविष्य में एक कवि के रूप में पहचान मिलेगी। अंताक्षरी में भाग लेते हुए मन में आया कि की स्वयं कविता का सृजन करूं तो मुकाबले में कोई हरा नहीं सकेगा। यहां से शुरुआत की थी आठ वर्ष के एक बालक संतोष कुमार शर्मा ने अपने लेखन के सफर की, आज हास्य रस के कवि के रूप में देश में अपना पहचान बना चुके हैं बाबा कानपुरी।
लेखन का शौक तो पैदा हो गया, लेकिन मंच पर कवियों के बीच पहुंच अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का मौका मिला 1975 में। लालगंज तहसील में एक कवि सम्मेलन के दौरान बाबा कानपुरी को पहली बार मंच पर कविता पाठ करने का मौका मिला। बाबा कानपुरी की पहली कृति बाबा कवि बर्राए के नाम से 1981 में प्रकाशित हुई। कविता की सभी विधाओं में लेखन में पारंगत बाबा कानपुरी ने गीत, गजल, दोहे, कुंडली, धनाक्षरी छंद सहित सभी विधाओं में रचानाएं की। कवि के रूप में पहला पुरस्कार उन्हें 1986-87 में मंगतराम मस्त अवार्ड के रूप में मिला। पंडित सुमित्रा नंदन पंत बाल साहित्य से पुरस्कृत बाबा ने बज पढ़ाई शुरू की थी तो सोचा नहीं था कि आगे क्या करना है, सिर्फ इतना तय किया था कि उच्च शिक्षा ग्रहण करनी है। कानपुर से एमए बीएड करने वाले बाबा कानपुरी ने वहां अपने बड़े भाई के पास रहकर शिक्षा ली। अपने खर्च के लिए वह बच्चों को गणित, ¨हदी और संस्कृत का ट्यूशन देते थे, इसी उनकी पढ़ाई चलती और अपना खर्च भी चलता था। 1980 में जब नोएडा में पहले दूरभाष केंद्र का शुभारंभ हुआ तो वह दूरभाष परिचालक के पद पर तैनात होकर नोएडा आए थे। 30 जून को वह यहां से सेवानिवृत हो रहे हैं। बाबा कानपुरी बताते हैं कि बच्चे जब छोटे थे अपनी पत्नी के पास उन्हें छोड़कर कवि सम्मेलन में जाना पड़ता था, उनकी पत्नी को उनके कवि होने से शिकायत तो हुई, लेकिन कभी उन्हें हतोत्साहित नहीं किया, न ही कभी लेखन के शौक का विरोध किया।
इंदिरा के मामा ने दिया था 'बाबा' नाम
बाबा कानपुरी का वास्तविक नाम संतोष कुमार शर्मा है। बाबा नाम पड़ने के पीछे एक कहानी है। हुआ यूं कि 1976 में जब वह कानपुर में पढ़ाई कर रहे थे तो कानपुर विवि की तरफ से बिठूर में युवा कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में इंदिरा गांधी के मामा डॉ. कैलाश नाथ कौल आए हुए थे। कवि के रूप में मंच पर पहुंच बाबा कानपुरी ने उन पर व्यंग्य रचना सुना दी। मौके पर बनाई और सुनाई गई उस व्यंग्य रचना से प्रभावित होकर डॉ. कैलाश नाथ कौल ने मंच से कहा कि लेखन और कविता के क्षेत्र में यह बालक काका हाथरसी से आगे जाएगा और काका से बढ़कर बाबा के रूप में जाना जाएगा। उस दिन के बाद से कॉलेज के छात्र और सहपाठी उन्हें बाबा कहकर पुकारने लगे। इसके बाद कवियों ने भी उन्हें बाबा के रूप में स्वीकार किया। कानुपर में पढ़ाई-लिखाई और वहां से कवि के रूप में बनाई गई पहचान के कारण उनका नाम बाबा कानपुरी पड़ा।
