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Ramnagar Fort of Varanasi : भव्यता की छांव में धरोहर, राजसी ऐश्वर्य की कई कहानी

काशी में गंगा के पूर्वी तट पर करीब 300 वर्षों से भव्यता की पहचान बने रामनगर दुर्ग में अनमोल विरासत सहेजी गई है। यहां बने संग्रहालय में राजसी उपयोग में आने वाली अनेक वस्तुओं वाहनों हथियारों के साथ ही रामलीला के दृश्यों संग सजीव होती पालकियों की अनूठी शान है।

By Saurabh ChakravartyEdited By: Updated: Fri, 29 Jul 2022 10:33 PM (IST)
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काशी में गंगा के पूर्वी तट पर भव्यता की पहचान बने रामनगर दुर्ग में अनमोल विरासत सहेजी गई है।
वाराणसी, संजय यादव। काशी में गंगा के पूर्वी तट पर करीब 300 वर्षों से भव्यता की पहचान बने रामनगर दुर्ग में अनमोल विरासत सहेजी गई है। यहां बने संग्रहालय में राजसी उपयोग में आने वाली अनेक वस्तुओं, वाहनों, हथियारों के साथ ही रामलीला के दृश्यों संग सजीव होती पालकियों की अनूठी शान है। दुर्ग में रखी पालकी, पुरानी कारों और हथियारों की विशेषता कुछ खास ही हैं।

पालकी से नहीं झपकती पलक

- 14 पालकियां सहेजकर रखी गई हैं विश्व प्रसिद्ध रामनगर के किले में

रामनगर का भव्य किला अपनी प्राचीन मुगल-भारतीय और स्थापत्य सौंदर्य के लिए विश्व प्रसिद्ध है। 18वीं शताब्दी में बने इस किले में रखी 14 पालकियों पर अगर एक बार नजर टिक जाए तो कुछ क्षण तक पलक भी नहीं झपकती है। किले का निर्माण 1750 में काशी नरेश राजा बलवंत सिंह ने कराया था।

पहले बात करते हैं 'चौवंशी' पालकी की। इस पालकी का उपयोग रामलीला के समय तब किया जाता है, जब माता सीता जनकपुर से प्रभु श्रीराम से विवाहोपरांत अयोध्या पहुंचती हैं। 'नालकी' पालकी से भगवान राम फुलवारी में जाते हैं। राजाओं ने अपने समय में गर्मी से बचाव के लिए घास से बनी 'खस पालकी' का भी निर्माण कराया था। घास से बनी पालकी की खासियत यह थी कि पालकी पर पानी का छिड़काव करने के बाद चार से पांच घंटे तक पालकी एकदम ठंडी रहती थी।

ऐसे ही आकर्षण का केंद्र है 'तोड़दार पालकी'। इस पालकी पर मेवाड़ के चित्रकारों ने कलाकृतियां उकेरी हैं। इससे प्रसन्न होकर तत्कालीन काशीराज महाराज उदित नारायण सिंह (1770-1835) ने उस वक्त कलाकारों को एक लाख 40 हजार मुद्राएं दी थीं। जब किले में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ पहुंची थीं तो उन्हें बारिश से बचाने के लिए महाराज विभूति नारायण ने 'रेनी पालकी' का निर्माण करवाया था। वहीं 1822 की 'मीनाकारी पालकी' तो विशिष्ट है। इसे अकबर शाह द्वितीय ने महाराजा ईश्वरी नारायण सिंह को भेंट किया था।

राजसी ऐश्वर्य की कहानी कहतीं ये कारें

किले के संग्रहालय में विंटेज कारों का कलेक्शन भी पर्यटकों को लुभाता है। विदश से आईं ये कारें सैलानियों के आकर्षण का केंद्र होती हैं। 1970 में बेल्जियम से आई मिनरवा कार को शिक्षा की देवी का नाम दिया है। इसकी अलग ही खासियत है। इस कार का पहिया रथ की तरह होता है। हार्न व लाइट भी अलग प्रकार की। पहिये में लोहे के तिल लगे हैं और रबर चढ़ाया गया है। इन पहियों में हवा नहीं भरी जाती थी।

कैडीलक कार से भरत मिलाप देखने जाते थे काशीराज

रामनगर किले में रखी कैडीलक कार में छह सिलेंडर है। यह एक लीटर में एक किलोमीटर चलती है। इसी कार से काशीराज नाटी इमली भरत मिलाप देखने जाते थे। यह कार लकड़ी से बनी। यह कार अमेरिका से आई थी। वहीं प्लीमथ कार भी छह सिलेंडर की है। म्यूजियम में रखीं अन्य कारें भी आकर्षण का केंद्र हैं।

हथियार बढ़ाते हैं संग्रहालय की शान

आज भी पुराने हथियार किले के संग्रहालय की शान बढ़ाते हैं। रामनगर में बनी केनन मशीन गन ऐसी है जिसे चलाने के लिए आठ व्यक्तियों की जरूरत पड़ती है। वहीं हीरा, सोना व कीमती पत्थर जड़ी कई तलवारें भी आकर्षण का केंद्र हैं। संग्रहालय में 10 से 12 फीट लंबी लांग बैरल गन है। हाथियों को बेहोश करने के लिए एलिफाइट गन भी रखी गई है। आकर्षित करती है एक अंगुली से भी छोटी इटालियन गन। इस गन को रानियां अपनी सुरक्षा के लिए इस्तेमाल करती थीं।

नौ तोपों का है कलेक्शन

किले में आज भी नौ तोपें सुरक्षित रखी हैं। किले के मुख्य द्वार के दोनों ओर दो तोपें रखी हैं। सात तोपें किले के अंदर हैं। इनकी खासियत यह है कि आज भी ये तोपें उसी तरह काम करती हैं, जिस तरह महाराजाओं के कालखंड में। रामलीला के दौरान धनुष यज्ञ के दौरान तोप का इस्तेमाल किया जाता है। इससे पहले तोपों से सलामी भी दी जाती थी, लेकिन समय के साथ यह परंपरा बंद हो गई।

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